Imam-e-Ahle-Sunnat Alahazrat Imam Ahmed Raza Khan Barelvi Alaihirrahma ka ye kalam “Sunte Hain Ke Mahshar Mein Sirf Unki Rasai Hai” shafaat-e-mustafa ﷺ aur bargah-e-risalat mein besahara ummatiyon ki faryad ka ek shakarshah hai. Is kalam mein Alahazrat ne kyamat ke din Aaqa ﷺ ki pakiza rasai aur unke chashm-e-karam ka aisa chitra khincha hai jo har tutey hue dil ko ek nayi umeed deta hai.
Neeche is pakiza kalam ke mukammal lyrics teenon zabaanon (Roman Urdu, Hindi, aur Urdu) mein diye gaye hain, sath hi har ek sher ki mukammal Hindi tashreeh shamil hai.
📄 1. Sunte Hain Ke Mahshar Mein Sirf Unki Rasai Hai Naat Lyrics In Roman
Sunte hain ke mahshar mein sirf unki rasai hai Gar unki rasai hai lo jab to ban aayi hai
Muchla hai ke rahmat ne umeed bandhayi hai Kya baat tiri mujrim kya baat banayi hai
Sab ne saf-e-mahshar mein lalkar diya hum ko Ae be-kason ke aaqa ab teri duhai hai
Yoon to sab unhein ka hai par dil ki agar poochho Yeh toote hue dil hi khaas unki kamayi hai
Zair gaye bhi kab ke din dhalne pe hai pyare Uth mere akele chal kya der lagayi hai
Bazaar-e-amal mein to sauda na bana apna Sarkar karam tujh mein aibi ki samayi hai
Girte huon ko muzda sajde mein gire maula Ro ro ke shafaat ki tamheed uthayi hai
Ae dil yeh sulagna kya jalna hai to jal bhi uth Dam ghutne laga zalim kya dhooni ramayi hai
Mujrim ko na sharmao ahbab kafan dhak do Munh dekh ke kya hoga parde mein bhalayi hai
Ab aap hi sambhalein to kaam apne sambhal jayein Hum ne to kamayi sab khelon mein ganwayi hai
Ae ishq tire sadqe jalne se chhute saste Jo aag bujha degi woh aag lagayi hai
Hirs o havas-e-bad se dil tu bhi sitam kar le Tu hi nahi be-gana duniya hi parayi hai
Hum dil jale hain kis ke hat fitnon ke par-kale Kyun phoonk doon ik uff se kya aag lagayi hai
Taiba na sahi afzal makka hi bada zahid Hum ishq ke bande hain kyun baat badhayi hai
Matla mein yeh shak kya tha wallah Raza wallah Sirf unki rasai hai sirf unki rasai hai
📄 2. Sunte Hain Ke Mahshar Mein Sirf Unki Rasai Hai Naat Lyrics In Hindi
सुनते हैं कि महशर में सिर्फ़ उनकी रसाई है गर उनकी रसाई है लो जब तो बन आई है
मचला है कि रहमत ने उम्मीद बंधाई है क्या बात तिरी मुजरिम क्या बात बनाई है
सब ने सफ़-ए-महशर में ललकार दिया हम को ऐ बे-कसों के आक़ा अब तेरी दुहाई है
यूँ तो सब उन्हीं का है पर दिल की अगर पूछो यह टूटे हुए दिल ही ख़ास उनकी कमाई है
ज़ाइर गए भी कब के दिन ढलने पे है प्यारे उठ मेरे अकेले चल क्या देर लगाई है
बाज़ार-ए-अमल में तो सौदा न बना अपना सरकार करम तुझ में ऐबी की समाई है
गिरते हुओं को मज़्दा सज्दे में गिरे मौला रो रो के शफ़ाअत की तम्हीद उठाई है
ऐ दिल यह सुलगना क्या जलना है तो जल भी उठ दम घुटने लगा ज़ालिम क्या धूनी रमाई है
मुजरिम को न शरमाओ अहबाब कफ़न ढक दो मुँह देख के क्या होगा पर्दे में भलाई है
अब आप ही संभालें तो काम अपने संभल जाएँ हम ने तो कमाई सब खेलों में गँवाई है
ऐ इश्क़ तिरे सदक़े जलने से छुटे सस्ते जो आग बुझा देगी वह आग लगाई है
हिर्स ओ हवस-ए-बद से दिल तू भी सितम कर ले तू ही नहीं बे-गाना दुनिया ही पराई है
हम दिल जले हैं किस के हट फ़ितनों के पर-काले क्यों फूँक दूँ इक उफ़ से क्या आग लगाई है
तैबा न सही अफ़ज़ल मक्का ही बड़ा ज़ाहिद हम इश्क़ के बंदे हैं क्यों बात बढ़ाई है
मत्ला में यह शक़ क्या था वल्लाह रज़ा वल्लाह सिर्फ़ उनकी रसाई है सिर्फ़ उनकी रसाई है
📄 3. Sunte Hain Ke Mahshar Mein Sirf Unki Rasai Hai Naat Lyrics In Urdu (اُردو)
سُنتے ہیں کہ محشر میں صرف اُن کی رَسائی ہے گر اُن کی رَسائی ہے لو جب تو بن آئی ہے
مچلا ہے کہ رحمت نے اُمید بندھائی ہے کیا بات تِری مجرم کیا بات بَنائی ہے
سب نے صف محشر میں لَلکار دیا ہم کو اے بے کسوں کے آقا اب تیری دُہائی ہے
یُوں تو سب اُنہیں کا ہے پَر دل کی اگر پوچھو یہ ٹُوٹے ہوئے دِل ہی خاص اُن کی کمائی ہے
زائر گئے بھی کب کے دِن ڈَھلنے پہ ہے پیارے اُٹھ میرے اَکیلے چل کیا دیر لگائی ہے
بازارِ عمل میں تو سودا نہ بنا اپنا سرکار کرم تجھ میں عیبی کی سمَائی ہے
گرتے ہووں کو مژدہ سجدے میں گِرے مولیٰ رو رو کے شفاعت کی تمہید اُٹھائی ہے
اے دل یہ سلگنا کیا جلنا ہے تو جل بھی اُٹھ دَم گھٹنے لگا ظالِم کیا دُھونی رَمائی ہے
مجرم کو نہ شرماؤ احباب کفن ڈَھک دو مُنھ دیکھ کے کیا ہو گا پردے میں بھلائی ہے
اب آپ ہی سنبھالیں تو کام اپنے سنبھل جائیں ہم نے تو کمائی سب کھیلوں میں گنوائی ہے
اے عشق تِرے صَدقے جلنے سے چُھٹے سَستے جو آگ بجھا دے گی وہ آگ لگائی ہے
حرص و ہوسِ بَد سے دل تُو بھی سِتَم کر لے تُو ہی نہیں بے گانہ دُنیا ہی پَرائی ہے
ہم دِل جلے ہیں کس کے ہٹ فتنوں کے پر کالے کیوں پُھونک دُوں اِک اُف سے کیا آگ لگائی ہے
طیبہ نہ سہی اَفضل مَکّہ ہی بڑا زاہِد ہم عِشق کے بندے ہیں کیوں بات بڑھائی ہے
مَطْلَع میں یہ شک کیا تھا واللہ رضاؔ واللہ صرف اُن کی رَسائی ہے صرف اُن کی رَسائی ہے
📚 4. Complete Naat Ki Tashrih In Hindi (मुकम्मल व्याख्या)
सुनते हैं कि महशर में सिर्फ़ उनकी रसाई है / गर उनकी रसाई है लो जब तो बन आई है
तशरीह: आला हज़रत फ़रमाते हैं कि यह बात बिल्कुल सच है कि कयामत के मैदान में सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह के महबूब ﷺ की पहुँच (रसाई) और सिफ़ारिश चलेगी। और अगर महशर की उस विकट अदालत में हमारे आक़ा ﷺ की ही सिफ़ारिश चलनी है, तो समझो हम जैसे कमज़ोर गुनहगारों का काम तो बन गया, हमें किसी बात का डर नहीं।
मचला है कि रहमत ने उम्मीद बंधाई है / क्या बात तिरी मुजरिम क्या बात बनाई है
तशरीह: हुज़ूर ﷺ की शफ़ाअत और रहमत की गवाही सुनकर गुनहगारों का दिल मचल उठा है क्योंकि उन्हें माफ़ी की पक्की उम्मीद मिल गई है। ऐ गुनहगार बंदे! देख तेरी क़िस्मत कितनी बुलंद है कि इतने गुनाह करने के बाद भी आक़ा ﷺ के करम से तेरी बात बन गई है।
सब ने सफ़-ए-महशर में ललकार दिया हम को / ऐ बे-कसों के आक़ा अब तेरी दुहाई है
तशरीह: मैदान-ए-महशर में जब हमारे गुनाहों के कारण सब लोग हमें धिक्कार देंगे और कोई हमारा साथ नहीं देगा, ऐसे तन्हाई और बेबसी के आलम में, ऐ लाचारों और बेबसों के मददगार आक़ा ﷺ! हम सिर्फ़ आपकी ही दुहाई देंगे और आप ही हमारी लाज रखेंगे।
यूँ तो सब उन्हीं का है पर दिल की अगर पूछो / यह टूटे हुए दिल ही ख़ास उनकी कमाई है
तशरीह: वैसे तो इस पूरी कायनात की हर चीज़ पर मेरे आक़ा ﷺ का ही अधिकार है, लेकिन अगर दिल की हक़ीक़त पूछो तो जो दिल दुनिया के दुखों और गुनाहों के बोझ से टूट चुके हैं, वही टूटे हुए दिल हुज़ूर ﷺ की सबसे ख़ास पूँजी (कमाई) हैं, क्योंकि वे ऐसे ही दिलों को सहारा देते हैं।
ज़ाइर गए भी कब के दिन ढलने पे है प्यारे / उठ मेरे अकेले चल क्या देर लगाई है
तशरीह: आला हज़रत अपने दिल या किसी साथी से मुख़ातिब होकर कहते हैं कि ऐ प्यारे! मदीना शरीफ़ जाने वाले तीर्थयात्री (ज़ाइर) तो कब के रवाना हो चुके हैं और अब ज़िंदगी का दिन भी ढलने को है। अब तू अकेला क्यों बैठा है? उठ और बिना देर किए मदीना की राह पर चल पड़।
बाज़ार-ए-अमल में तो सौदा न बना अपना / सरकार करम तुझ में ऐबी की समाई है
तशरीह: नेकियों के इस बाज़ार में जब मैंने अपने कर्मों को देखा, तो मेरे पास कोई ऐसी नेकी नहीं थी जिससे मैं जन्नत का सौदा कर पाता। मगर ऐ मेरे आक़ा ﷺ! आपके असीमित करम के दरिया में हम जैसे ऐबदार और पापी इंसानों के लिए भी पूरी जगह (समाई) मौजूद है।
गिरते हुओं को मज़्दा सज्दे में गिरे मौला / रो रो के शफ़ाअत की तम्हीद उठाई है
तशरीह: गुनाहों के दलदल में गिरते हुए इंसानों के लिए यह बहुत बड़ी ख़ुशख़बरी (मज़्दा) है कि हमारे आक़ा ﷺ ख़ुद बारगाह-ए-इलाही में सज्दा करके उम्मत की माफ़ी के लिए रो-रोकर दुआ फ़रमा रहे हैं और उन्होंने हमारी शफ़ाअत (सिफ़ारिश) की शुरुआत कर दी है।
ऐ दिल यह सुलगना क्या जलना है तो जल भी उठ / दम घुटने लगा ज़ालिम क्या धूनी रमाई है
तशरीह: अपने दिल को इश्क़-ए-रसूल ﷺ की आग में तपने की प्रेरणा देते हुए आला हज़रत कहते हैं कि ऐ दिल! यह अंदर ही अंदर सुलगना कैसा? अगर जलना है तो हुज़ूर ﷺ के इश्क़ की आग में पूरी तरह जल उठ, इस तरह सुलगने से तो दम घुटने लगा है।
मुजरिम को न शरमाओ अहबाब कफ़न ढक दो / मुँह देख के क्या होगा पर्दे में भलाई है
तशरीह: अपनी आज़ी और गुनाहों पर नदामत का इज़हार करते हुए कहते हैं कि ऐ मेरे दोस्तों! मुझ गुनहगार के चेहरे से कफ़न हटाकर मुझे शर्मिंदा न करो। मेरे कर्म अच्छे नहीं हैं, इसलिए मेरा चेहरा देखने में कुछ नहीं रखा, मेरा चेहरा पर्दे में ढका रहे इसी में मेरी भलाई है।
अब आप ही संभालें तो काम अपने संभल जाएँ / हम ने तो कमाई सब खेलों में गँवाई है
तशरीह: ऐ मेरे आक़ा ﷺ! अब अगर आप स्वयं हमारे बिगड़े हुए कामों को संभाल लें तो ही हमारी नैया पार हो सकती है, क्योंकि हमने तो अपनी ज़िंदगी की सारी पूँजी (साँसें और वक़्त) दुनिया के खेल-तमाशे और ग़फ़लत में गँवा दी है।
ऐ इश्क़ तिरे सदक़े जलने से छुटे सस्ते / जो आग बुझा देगी वह आग लगाई है
तशरीह: ऐ इश्क़-ए-मुस्तफ़ा ﷺ! मैं तेरे ऊपर कुर्बान जाऊँ, क्योंकि तेरे कारण मैं जहन्नम की भयानक आग में जलने से बहुत सस्ते में बच गया। तूने मेरे दिल में मोहब्बत की जो आग लगाई है, वही आग कयामत के दिन जहन्नम की आग को बुझा देगी।
हिर्स ओ हवस-ए-बद से दिल तू भी सितम कर ले / तू ही नहीं बे-गाना दुनिया ही पराई है
तशरीह: इंसान के लालच और बुरी इच्छाओं पर तंज़ करते हुए कहते हैं कि ऐ दिल! अगर तू भी इस दुनिया की बुराइयों में खो जाना चाहता है तो कर ले ज़ुल्म, क्योंकि इस मतलबी दुनिया में सिर्फ़ तू ही अकेला बेगाना नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया ही पराई और अस्थाई है।
हम दिल जले हैं किस के हट फ़ितनों के पर-काले / क्यों फूँक दूँ इक उफ़ से क्या आग लगायी है
तशरीह: ज़माने के फ़ितनों और साज़िशों को ललकारते हुए फ़रमाते हैं कि ऐ कयामत की चालों! हमसे दूर रहो, हम मदीने वाले के इश्क़ में दिल जलाए बैठे हैं। तुम्हारी इस साज़िश की आग की हमारे सामने क्या हैसियत? हम चाहें तो इसे अपने मुँह की एक ‘उफ़’ (फूँक) से पल भर में बुझा दें।
तैबा न सही अफ़ज़ल मक्का ही बड़ा ज़ाहिद / हम इश्क़ के बंदे हैं क्यों बात बढ़ाई है
तशरीह: ऐ सूखी इबादत करने वाले ज़ाहिद (उपदेशक)! तू कहता है कि मक्का ही सबसे अफ़ज़ल और बड़ा है, तो ठीक है तेरी बात सही। मगर हम तो इश्क़ के मतवाले हैं, हमारे लिए तो हमारे महबूब का शहर मदीना (तैबा) ही सब कुछ है, इसलिए इस बहस को ज़्यादा बढ़ाने की ज़रूरत नहीं।
मत्ला में यह शक़ क्या था वल्लाह रज़ा वल्लाह / सिर्फ़ उनकी रसाई है सिर्फ़ उनकी रसाई है
तशरीह: कलाम के आख़िरी शेर (मक़्ते) में आला हज़रत अपने पहले शेर (मत्ले) की बात को दोहराते हुए कसम खाकर कहते हैं कि ऐ रज़ा! इस बात में शक की कोई गुंजाइश ही नहीं है, ख़ुदा की कसम मैदान-ए-महशर में सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे प्यारे आक़ा मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की ही हुकूमत और पहुँच (रसाई) होगी।



