📚 इतिहास-ए-इस्लाम (इस्लाम का इतिहास)
हिजरत का प्रथम वर्ष (Hijrat Ka Pehla Saal: Munafaqat Ki Ibtida Aur Tarikh-e-Islam)
📌 शीर्षक: कपटाचार (मुनाफकत) का बीजारोपण
मदीना शहर में अब्दुल्लाह बिन उबई बिन सलूल नाम का एक अत्यधिक चतुर, कूटनीतिज्ञ, अनुभवी और चालाक व्यक्ति निवास करता था। औस और ख़ज़रज नामक दोनों प्रमुख कबीलों पर उसका गहरा प्रभाव था और सभी लोग सर्वसम्मति से उसकी कयादत को स्वीकार करते थे।
हाल ही में हुए ‘बुआस के युद्ध’ में औस और ख़ज़रज कबीले एक-दूसरे के विरुद्ध संघर्षरत रहकर अपने कई पराक्रमी योद्धाओं को खो चुके थे, जिससे उनकी सैन्य क्षमता अत्यधिक क्षीण हो गई थी। अब्दुल्लाह बिन उबई ने इस परिस्थिति का पूर्ण लाभ उठाया और दोनों गुटों में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने का कोई अवसर नहीं गँवाया। मदीना निवासी यह योजना बना रहे थे कि अब्दुल्लाह बिन उबई को पूरे नगर का सर्वोच्च शासक नियुक्त कर दिया जाए और एक भव्य आयोजन में आधिकारिक रूप से उसकी ताजपोशी की घोषणा की जाए; यहाँ तक कि उसके लिए एक शाही मुकुट भी तैयार करवा लिया गया था।
ठीक इसी समयावधि में मदीना की धरती पर इस्लाम का आगमन हुआ और नबी-ए-करीम (हज़रत मोहम्मद ﷺ) का पदार्पण हुआ।
🤝 मुसलमानों की बढ़ती शक्ति और अब्दुल्लाह बिन उबई की ईर्ष्या
पैगंबर साहब (हज़रत मोहम्मद ﷺ) के मदीना आगमन के उपरांत, मुस्लिम समुदाय नगर की सबसे प्रभावशाली शक्ति के रूप में उभरा। अंततः मदीना के ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर करके सभी वर्गों ने मुसलमानों की नेतृत्वकारी भूमिका को स्वीकार कर लिया। इस घटनाक्रम का स्वाभाविक परिणाम यह हुआ कि अब्दुल्लाह बिन उबई की सत्ता हासिल करने की तमाम अभिलाषाओं पर पानी फिर गया और उसका राजा बनने का स्वप्न चूर-चूर हो गया।
चूँकि वह अत्यंत धूर्त एवं चालाक प्रवृत्ति का व्यक्ति था, इसलिए यद्यपि वह पैगंबर साहब ﷺ को अपना मुख्य प्रतिद्वंद्वी और शत्रु समझता था, फिर भी इस शत्रुता को सार्वजनिक करना अपने हित में न मानकर अपने मन में छिपाए रखता था। औस और ख़ज़रज कबीलों के जो लोग उस समय तक मूर्तिपूजक थे, वे सभी अब्दुल्लाह बिन उबई के ही प्रभाव क्षेत्र में आते थे।
⚔️ क़ुरैश-ए-मक्का का षड्यंत्र और धमकी भरा पत्र
जब मक्का के क़ुरैशियों को यह सूचना मिली कि पैगंबर साहब ﷺ अपने अनुयायियों के साथ मदीना में शांतिपूर्वक स्थापित हो चुके हैं और इस्लाम का प्रभाव निरंतर बढ़ रहा है, तो उन्होंने अपनी पहली चाल चलते हुए अब्दुल्लाह बिन उबई और मदीना के मूर्तिपूजकों को एक चेतावनी भरा संदेश भेजा:
“तुमने हमारी इच्छा के विरुद्ध हमारे विरोधी को अपने यहाँ आश्रय दे रखा है। तुम्हारे हित में यही होगा कि तुम उनसे युद्ध करो और उन्हें अपने नगर से निष्कासित कर दो। यदि तुमने ऐसा नहीं किया, तो हम संपूर्ण सैन्य बल के साथ मदीना पर चढ़ाई करेंगे, तुम्हारे युवाओं का संहार कर देंगे और तुम्हारी स्त्रियों को बंदी बना लेंगे।”
🕊️ पैगंबर साहब ﷺ की कूटनीतिक दूरदर्शिता
इस धमकी भरे संदेश के मिलते ही अब्दुल्लाह बिन उबई ने मूर्तिपूजकों की एक सभा बुलाई और मक्का के संदेश से अवगत कराते हुए सभी को मुसलमानों के विरुद्ध युद्ध के लिए उकसाने लगा। सौभाग्यवश, पैगंबर साहब ﷺ को इस गुप्त बैठक और षड्यंत्र का ज्ञान हो गया। आप ﷺ तुरंत उस जनसमूह के मध्य पहुँचे और लोगों को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया:
“मक्का के क़ुरैशी तुम्हें भड़काकर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं। यदि तुम उनकी धमकियों और छलावे में आ गए, तो स्वयं अपना ही अपूरणीय अहित कर बैठोगे। तुम्हारे लिए बुद्धिमत्ता इसी में है कि तुम उन्हें स्पष्ट शब्दों में नकार दो और हमारे साथ किए गए शांति समझौते पर दृढ़ रहो। यदि क़ुरैशी मदीना पर आक्रमण करते हैं, तो हम सब संगठित होकर उनका मुकाबला करेंगे जो कि अत्यंत सुगम होगा। किंतु यदि तुम मुसलमानों से उलझे, तो अपने ही हाथों अपने भाइयों, पुत्रों और सगे-संबंधियों का संहार करके स्वयं को मिटा बैठोगे।”
पैगंबर साहब ﷺ के इस तार्किक दृष्टिकोण से पूरी सभा सहमत हो गई और क्षण भर में वह भीड़ शांत होकर तितर-बितर हो गई। अब्दुल्लाह बिन उबई हतप्रभ होकर केवल देखता ही रह गया।
🕌 प्रथम हिजरी वर्ष के अन्य मुख्य घटनाक्रम
- अज़ान का प्रारंभ: इसी वर्ष नमाज़ हेतु श्रद्धालुओं को एकत्र करने के लिए विधिवत अज़ान देने की प्रथा आरंभ हुई।
- हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम (रज़ि.) का धर्मांतरण: इसी वर्ष यहूदी समुदाय के प्रख्यात विद्वान हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम (रज़ि.) ने इस्लाम अंगीकार किया।
- हज़रत सलमान फ़ारसी (रज़ि.) का आगमन: इसी वर्ष हज़रत सलमान फ़ारसी (रज़ि.)—जो प्रारंभ में पारसी थे, तदुपरांत ईसाई धर्म स्वीकार किया था और प्राचीन धर्मग्रंथों के अध्ययन के आधार पर अंतिम पैगंबर की प्रतीक्षा कर रहे थे—पैगंबर साहब ﷺ की सेवा में उपस्थित होकर मुस्लिम हुए।
- ज़कात का विधान: इसी वर्ष धनिकों पर निर्धनों के कल्याण हेतु ‘ज़कात’ (धार्मिक दान) अनिवार्य घोषित किया गया।
📚 تاریخِ اسلام
ہجرت کا پہلا سال
📌 عنوان: منافقت کا بیج اور اس کی ابتداء
مدینہ منورہ میں عبداللہ بن ابی ابن سلول نامی ایک انتہائی چالاک، عقل مند، تجربہ کار اور سیاست دان شخص رہتا تھا۔ اوس اور خزرج دونوں بڑے قبائل پر اس کا گہرا اثر تھا اور تمام لوگ متفقہ طور پر اس کی سرداری کو تسلیم کرتے تھے۔
کچھ ہی عرصے پہلے ‘جنگِ بعاث’ میں اوس اور خزرج کے قبائل ایک دوسرے کے خلاف خونریز جنگ لڑ چکے تھے، جس میں ان کے کئی نامور بہادر اور جنگجو مارے گئے تھے اور دونوں قبائل شدید کمزور ہو چکے تھے۔ عبداللہ بن ابی نے اس نازک صورتحال کا پورا فائدہ اٹھایا اور دونوں قوموں میں اپنا اثر و رسوخ بڑھانے میں کوئی کسر نہ چھوڑی۔ مدینہ کے لوگ یہ منصوبہ بنا رہے تھے کہ عبداللہ بن ابی کو پورے مدینہ کا بادشاہ یا سربراہِ اعلیٰ مقرر کر دیا جائے اور ایک بڑا جلسہ منعقد کر کے باقاعدہ اس کی تاجپوشی کا اعلان کیا جائے؛ یہاں تک کہ اس کے لیے ایک شاہی تاج بھی تیار کروا لیا گیا تھا۔
ٹھیک اسی دوران مدینہ کی سرزمین پر اسلام کی روشنی پہنچی اور نبی کریم (حضرت محمد ﷺ) کی تشریف آوری ہوئی۔
🤝 مسلمانوں کا بڑھتا ہوا اثر اور عبداللہ بن ابی کی حسد
رسول اللہ ﷺ کے مدینہ منورہ تشریف لانے کے بعد مسلمان شہر کی سب سے بڑی اور منظم طاقت بن کر ابھرے۔ بالآخر مدینہ کے تاریخی معاہدے (میثاقِ مدینہ) پر تمام گروہوں نے دستخط کر کے مسلمانوں کی قیادت اور برتری کو تسلیم کر لیا۔ اس سیاسی تبدیلی کا نتیجہ یہ نکلا کہ عبداللہ بن ابی کی بادشاہت کی تمام امیدوں پر پانی پھر گیا اور اس کا سردار بننے کا خواب خاک میں مل گیا۔
چونکہ وہ حد درجہ ہوشیار اور مکار آدمی تھا، اس لیے اگرچہ وہ رسول اللہ ﷺ کو اپنا سب سے بڑا حریف اور دشمن سمجھتا تھا، لیکن اس دشمنی کا کھلم کھلا اظہار اپنے لیے نقصان دہ سمجھ کر بغض کو دل میں چھپائے رکھتا تھا۔ اوس اور خزرج کے جو لوگ اس وقت تک بت پرست تھے، وہ سب عبداللہ بن ابی ہی کے زیرِ اثر تھے۔
⚔️ قریشِ مکہ کی سازش اور دھمکی آمیز خط
جب مکہ کے قریش کو یہ خبر ملی کہ رسول اللہ ﷺ اور ان کے صحابہ مدینہ میں مکمل امن و سکون کے ساتھ قیام پذیر ہو چکے ہیں اور اسلام کا دائرہ دن بہ دن پھیل رہا ہے، تو انہوں نے پہلی شرارت اور سازش یہ کی کہ عبداللہ بن ابی اور مدینہ کے مشرکین کو ایک دھمکی آمیز پیغام بھیجا:
“تم نے ہماری مرضی کے خلاف ہمارے مخالف کو اپنے ہاں پناہ دے رکھی ہے۔ تمہارے لیے بہتری اسی میں ہے کہ تم ان سے جنگ کرو اور انہیں اپنے شہر سے نکال دو۔ اگر تم نے ایسا نہ کیا تو ہم اپنے پورے فوجی ساز و سامان کے ساتھ مدینہ پر حملہ آور ہوں گے، تمہارے جوانوں کو قتل کر دیں گے اور تمہاری عورتوں پر قبضہ کر لیں گے۔”
🕊️ رسول اللہ ﷺ کی حکمتِ عملی اور تدبر
اس دھمکی آمیز خط کے ملتے ہی عبداللہ بن ابی نے تمام مشرکینِ مدینہ کو اکٹھا کیا اور مکہ والوں کے پیغام سے آگاہ کر کے سب کو مسلمانوں کے خلاف جنگ پر اکسانے لگا۔ اتفاق سے رسول اللہ ﷺ کو اس خفیہ اجلاس اور سازش کی خبر ہو گئی۔ آپ ﷺ فوراً اس مجمع میں تشریف لے گئے اور لوگوں کو مخاطب کر کے ارشاد فرمایا:
“قریشِ مکہ تم کو آپس میں لڑا کر دھوکہ دینا چاہتے ہیں۔ اگر تم ان کی دھمکی اور چالاکی میں آ گئے تو اپنا ہی بہت بڑا نقصان کر بیٹھو گے۔ تمہارے لیے عقلمندی یہ ہے کہ تم انہیں صاف جواب دے دو اور ہمارے ساتھ کیے گئے اپنے امن کے معاہدے پر قائم رہو۔ اگر قریش نے مدینہ پر حملہ کیا تو ہم سب مل کر ان کا مقابلہ کریں گے جو کہ بہت آسان ہوگا، لیکن اگر تم مسلمانوں سے لڑے تو اپنے ہی ہاتھوں اپنے بیٹوں، بھائیوں اور رشتہ داروں کو قتل کرو گے اور خود برباد ہو جاؤ گے۔”
رسول اللہ ﷺ کی اس حکمت سے بھری بات کو سن کر پورا مجمع متفق ہو گیا اور دیکھتے ہی دیکھتے تمام لوگ وہاں سے منتشر ہو گئے۔ عبداللہ بن ابی حیران و پریشان دیکھتا ہی رہ گیا۔
🕌 ہجرت کے پہلے سال کے دیگر اہم واقعات
اذان کی ابتداء: اسی سال نماز کے لیے مسلمانوں کو جمع کرنے کی خاطر باقاعدہ اذان دینے کا طریقہ شروع ہوا۔
سیدنا عبداللہ بن سلام ؓ کا اسلام: اسی سال یہود کے ایک بہت بڑے اور جلیل القدر عالم سیدنا عبداللہ بن سلام رضی اللہ عنہ مشرف بہ اسلام ہوئے۔
سیدنا سلمان فارسی ؓ کی آمد: اسی سال سیدنا سلمان فارسی رضی اللہ عنہ—جو پہلے مجوسی (آتش پرست) تھے، پھر عیسائیت اختیار کی اور قدیم آسمانی کتابوں کے مطالعے کے بعد آخری نبی کے منتظر تھے—بارگاہِ رسالت میں حاضر ہو کر اسلام لائے۔
زکوٰۃ کی فرضیت: اسی سال صاحبِ نصاب مسلمانوں پر مال کی زکوٰۃ فرض کی گئی۔



