Jang Shuru Ho Gayi (Ghazwa-e-Uhud) | Hijrat Ka Teesra Saal | Tareekh-e-Islam

Jang Shuru Ho Gayi (Ghazwa-e-Uhud) | Hijrat Ka Teesra Saal | Tareekh-e-Islam

ग़ज़वा-ए-उहुद का युद्ध आरंभ

जब दोनों सेनाएँ पूरी तरह युद्ध के लिए तैयार हो गईं, तो ग़ज़वा-ए-उहुद का वास्तविक संघर्ष आरंभ हुआ। यह केवल दो सेनाओं के बीच लड़ाई नहीं थी, बल्कि सत्य और असत्य, ईमान और कुफ़्र के बीच एक निर्णायक मुकाबला था।

मुस्लिम सेना अल्लाह पर पूर्ण भरोसा रखते हुए मैदान में उतरी, जबकि क़ुरैश बद्र की हार का बदला लेने के इरादे से पूरी तैयारी के साथ आए थे।

अबू आमिर राहिब की असफल चाल

युद्ध की शुरुआत एक ऐसी घटना से हुई जिसने मुनाफ़िक़ों और इस्लाम के विरोधियों की मानसिकता को उजागर कर दिया।

सबसे पहले अबू आमिर राहिब क़ुरैश की सेना से निकलकर मैदान में आया।

वह मूल रूप से मदीना का रहने वाला था और क़बीला औस से संबंध रखता था। इस्लाम आने से पहले वह अपनी क़ौम में एक बड़ा धार्मिक व्यक्ति और सम्मानित बुज़ुर्ग माना जाता था।

लेकिन जब रसूलुल्लाह ﷺ मदीना आए और लोगों ने इस्लाम स्वीकार करना शुरू किया, तो उसके दिल में ईर्ष्या और द्वेष भर गया।

वह मुसलमानों का विरोध करते हुए मक्का चला गया और क़ुरैश के साथ मिल गया।

उसे पूरा विश्वास था कि यदि वह युद्ध के मैदान में अपने क़बीले औस के लोगों को पुकारेगा, तो वे उसका साथ देंगे और रसूलुल्लाह ﷺ का साथ छोड़ देंगे।

अंसार ने दिया करारा जवाब

अबू आमिर राहिब मैदान में आगे बढ़ा और ऊँची आवाज़ में बनू औस को पुकारने लगा।

उसने उन्हें अपनी ओर आने के लिए कहा।

लेकिन अंसार के ईमान की मजबूती उसके अनुमान से कहीं अधिक थी।

उन्होंने उसकी बात सुनते ही उसे कड़े शब्दों में ठुकरा दिया।

उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि अब उनकी निष्ठा केवल अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के साथ है।

अबू आमिर की योजना पूरी तरह विफल हो गई।

वह अत्यंत अपमानित, निराश और शर्मिंदा होकर वापस लौट गया।

यह घटना इस बात का प्रमाण थी कि इस्लाम ने अंसार के दिलों में ऐसा ईमान पैदा कर दिया था जिसे कोई भी लालच, रिश्ता या पुरानी प्रतिष्ठा डिगा नहीं सकती थी।

दोनों सेनाओं में भीषण युद्ध शुरू हुआ

अब किसी प्रकार की बातचीत या समझौते की संभावना समाप्त हो चुकी थी।

दोनों सेनाओं ने एक-दूसरे पर पूरी शक्ति के साथ हमला कर दिया।

उहुद का मैदान तलवारों की चमक, तीरों की वर्षा और तकबीर की आवाज़ों से गूँज उठा।

हर ओर घमासान युद्ध छिड़ गया।

मुसलमान संख्या में कम होने के बावजूद पूरे साहस के साथ लड़ रहे थे।

हज़रत हमज़ा (रज़ि.) की वीरता

युद्ध के प्रारंभिक चरण में हज़रत हमज़ा बिन अब्दुल मुत्तलिब (रज़ि.) ने ऐसी बहादुरी दिखाई कि दुश्मन की पंक्तियाँ बिखरने लगीं।

वे पूरी ताकत के साथ क़ुरैश पर टूट पड़े।

जिस दिशा में वे बढ़ते, दुश्मन पीछे हटने लगता।

कई प्रमुख क़ुरैशी योद्धा उनके हाथों मारे गए।

उनकी वीरता देखकर मुस्लिम सैनिकों का मनोबल और ऊँचा हो गया।

हज़रत अली (रज़ि.) और अन्य सहाबा की बहादुरी

हज़रत अली (रज़ि.), हज़रत अबू दुजाना (रज़ि.) और अनेक अन्य सहाबा ने भी युद्ध में अद्भुत साहस का परिचय दिया।

वे पूरी निडरता के साथ दुश्मन की पंक्तियों में घुस जाते और बड़ी वीरता से युद्ध करते।

उनकी बहादुरी देखकर क़ुरैश के सैनिकों का उत्साह धीरे-धीरे टूटने लगा।

कई लोग मैदान छोड़कर पीछे हटने लगे।

युद्ध का पलड़ा मुसलमानों की ओर झुकता दिखाई देने लगा।

हज़रत अबू दुजाना (रज़ि.) की महान उदारता

रसूलुल्लाह ﷺ की तलवार लेकर युद्ध कर रहे हज़रत अबू दुजाना (रज़ि.) दुश्मनों को परास्त करते हुए क़ुरैश की पंक्तियों को चीरते हुए आगे बढ़ते गए।

इसी दौरान वे उस स्थान तक पहुँच गए जहाँ हिन्द बिन्त उत्बा, जो अबू सुफ़ियान की पत्नी थी, मौजूद थी।

वह वही महिला थी जिसने बद्र के युद्ध में अपने परिजनों की मृत्यु के बाद मुसलमानों के विरुद्ध लोगों को भड़काया था।

जब उसने हज़रत अबू दुजाना (रज़ि.) को अपनी ओर बढ़ते देखा, तो उसे लगा कि अब उसकी मृत्यु निश्चित है।

वह भय से चीख उठी।

रसूलुल्लाह ﷺ की तलवार को महिला के ख़ून से नहीं रंगा

हज़रत अबू दुजाना (रज़ि.) आसानी से उसे मार सकते थे।

लेकिन जैसे ही उन्होंने देखा कि सामने एक महिला है, उन्होंने तुरंत अपना हाथ रोक लिया।

उन्होंने मन में विचार किया कि रसूलुल्लाह ﷺ की दी हुई तलवार किसी महिला के ख़ून से नहीं रंगी जानी चाहिए।

इस प्रकार उन्होंने उसे कोई हानि नहीं पहुँचाई।

हिन्द बिन्त उत्बा की जान बच गई।

यह घटना इस्लाम की उच्च नैतिकता और युद्ध के नियमों का उत्कृष्ट उदाहरण है।

इससे स्पष्ट होता है कि मुसलमान युद्ध के मैदान में भी महिलाओं पर हमला नहीं करते थे और रसूलुल्लाह ﷺ की शिक्षाओं का पालन करते थे।

प्रारंभिक विजय के संकेत

हज़रत हमज़ा (रज़ि.), हज़रत अली (रज़ि.), हज़रत अबू दुजाना (रज़ि.) तथा अन्य बहादुर सहाबा की वीरता के कारण क़ुरैश की सेना के हौसले पस्त होने लगे।

मुस्लिम सेना लगातार आगे बढ़ रही थी।

ऐसा प्रतीत हो रहा था कि अल्लाह तआला मुसलमानों को एक बार फिर बद्र जैसी शानदार विजय प्रदान करने वाले हैं।

लेकिन इसी समय एक ऐसी घटना घटी जिसने पूरे युद्ध की दिशा बदल दी।

Syedna Hamza (RA) Ki Shahadat – Ghazwa-e-Uhud Ka Sabse Dardnaak Waqia

Previous Post
Next Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Features

Most Recent Posts

  • All Post
  • Allah and Prophets
  • Dua Hindi Urdu
  • Hadith
  • Hijrat ka dusra saal
  • Islamic Article
  • Islamic History
  • Jange-Badr
  • Naat Lyrics
    •   Back
    • Pehli Rajnitik Dastavez
    • Hijrat ak teesra saal
    •   Back
    • Jange-badr

Explore Our Startup

Lorem Ipsum is simply dumy text of the printing typesetting industry lorem.

Category