Syedna Hamza (RA) Ki Shahadat – Ghazwa-e-Uhud Ka Sabse Dardnaak Waqia | Hijrat Ka Teesra Saal
हज़रत हमज़ा (रज़ि.) की शहादत और मुसलमानों की प्रारंभिक विजय
हज़रत हमज़ा (रज़ि.) की अद्भुत वीरता
ग़ज़वा-ए-उहुद के दौरान हज़रत हमज़ा बिन अब्दुल मुत्तलिब (रज़ि.) पूरी बहादुरी और जोश के साथ दुश्मन की सेना पर टूट पड़े।
युद्ध के आरंभिक चरण में उन्होंने क़ुरैश के झंडाबरदार तल्हा पर हमला किया और उसे मार गिराया।
इसके बाद वे दोनों हाथों से तलवार चलाते हुए दुश्मनों की पंक्तियों को चीरते चले गए।
जहाँ भी हज़रत हमज़ा (रज़ि.) पहुँचते, वहाँ क़ुरैश के सैनिकों में भगदड़ मच जाती।
उनकी वीरता देखकर मुसलमानों का उत्साह बढ़ता जा रहा था, जबकि दुश्मन का मनोबल लगातार गिर रहा था।
वह्शी घात लगाकर बैठा था
दूसरी ओर वह्शी, जो एक हब्शी (अबीसीनियाई) गुलाम था और भाला चलाने में अत्यंत निपुण था, केवल एक अवसर की प्रतीक्षा कर रहा था।
उसका उद्देश्य किसी सामान्य सैनिक को मारना नहीं था।
उसे विशेष रूप से हज़रत हमज़ा (रज़ि.) को निशाना बनाने के लिए भेजा गया था।
वह एक बड़े पत्थर की ओट में छिपकर बैठ गया और लगातार हज़रत हमज़ा (रज़ि.) की गतिविधियों पर नज़र रखता रहा।
जब उसने देखा कि हज़रत हमज़ा (रज़ि.) दुश्मनों को परास्त करते हुए आगे निकल गए हैं और उचित अवसर मिल गया है, तब उसने अपना भाला पूरी ताकत से उनकी ओर फेंका।
हज़रत हमज़ा (रज़ि.) की शहादत
वह्शी का फेंका हुआ भाला अत्यंत सटीक लगा।
भाला हज़रत हमज़ा (रज़ि.) के शरीर के एक पहलू से प्रवेश करता हुआ दूसरे पहलू से निकल गया।
यह घाव अत्यंत गंभीर था।
कुछ ही क्षणों बाद हज़रत हमज़ा (रज़ि.) अल्लाह की राह में शहीद हो गए।
उनकी शहादत मुसलमानों के लिए अत्यंत दुःखद घटना थी।
रसूलुल्लाह ﷺ के प्रिय चाचा, इस्लाम के महान योद्धा और “असदुल्लाह” (अल्लाह का शेर) कहलाने वाले हज़रत हमज़ा (रज़ि.) ने अपने प्राण इस्लाम की रक्षा में न्योछावर कर दिए।
उनकी शहादत के बाद वह्शी तुरंत हिन्द बिन्त उत्बा के पास गया और उसे यह समाचार दिया कि उसका उद्देश्य पूरा हो चुका है।
हज़रत हंज़ला (रज़ि.) का साहस
इसी बीच हज़रत हंज़ला (रज़ि.) ने भी अद्भुत बहादुरी का प्रदर्शन किया।
उन्होंने दुश्मनों पर ऐसा भीषण हमला किया कि उनके सामने आने वाले सैनिक पीछे हटने लगे।
युद्ध करते-करते वे अबू सुफ़ियान तक पहुँच गए।
वे उस पर वार करने ही वाले थे कि अचानक शद्दाद बिन असवद लैसी पीछे से आया और उसने हज़रत हंज़ला (रज़ि.) पर हमला कर दिया।
इस वार में हज़रत हंज़ला (रज़ि.) शहीद हो गए।
उन्होंने अंत तक बहादुरी और दृढ़ता का परिचय दिया।
हज़रत नज़र बिन अनस (रज़ि.) और सअद बिन रबी (रज़ि.) की वीरता
युद्ध के दौरान हज़रत नज़र बिन अनस (रज़ि.) और हज़रत सअद बिन रबी (रज़ि.) ने भी असाधारण साहस का परिचय दिया।
उन्होंने बड़ी वीरता से दुश्मनों का मुकाबला किया और इस्लाम की रक्षा के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा दी।
उनकी बहादुरी ने मुस्लिम सेना का मनोबल और अधिक बढ़ा दिया।
क़ुरैश के झंडाबरदार एक-एक करके मारे गए
युद्ध के दौरान क़ुरैश के लिए उनका युद्ध ध्वज (झंडा) सम्मान और मनोबल का प्रतीक था।
जब भी उनका कोई झंडाबरदार मारा जाता, दूसरा तुरंत झंडा उठा लेता।
लेकिन मुसलमानों के लगातार आक्रमणों के कारण एक के बाद एक कुल बारह झंडाबरदार मारे गए।
हर बार झंडा गिरता और कोई दूसरा उसे उठा लेता।
आख़िरकार जब अंतिम झंडाबरदार सवाब भी मारा गया, तब क़ुरैश में किसी की हिम्मत नहीं हुई कि वह झंडा फिर से उठाए।
युद्ध का ध्वज मैदान में ही गिरा रह गया।
यह क़ुरैश के टूटते हुए मनोबल का स्पष्ट संकेत था।
मुसलमानों के प्रबल आक्रमण से क़ुरैश पीछे हटने लगे
मुसलमानों की लगातार तलवारबाज़ी, अनुशासन और वीरता के सामने लगभग तीन हज़ार क़ुरैशी सैनिक भी टिक नहीं सके।
उनकी पंक्तियाँ बिखरने लगीं।
दोपहर के समय तक क़ुरैश की सेना पीछे हटने लगी।
पहले वे लड़ते हुए पीछे हटे, लेकिन थोड़ी ही देर बाद उन्होंने पूरी तरह मैदान छोड़कर भागना शुरू कर दिया।
यह मुसलमानों की स्पष्ट बढ़त का संकेत था।
क़ुरैश की महिलाएँ भी भागने लगीं
युद्ध के पीछे क़ुरैश की महिलाएँ ढोल बजाकर और जोशीले गीत गाकर अपने सैनिकों का उत्साह बढ़ा रही थीं।
इन महिलाओं का नेतृत्व हिन्द बिन्त उत्बा कर रही थी।
लेकिन जब उन्होंने देखा कि क़ुरैश की सेना भाग रही है, तो वे स्वयं भी घबरा गईं।
उन्होंने अपना सामान वहीं छोड़ दिया और भागते हुए सैनिकों के साथ मैदान से निकलने लगीं।
हिन्द बिन्त उत्बा, जो महिलाओं की प्रमुख थी, वह भी भय और घबराहट में अपना सामान छोड़कर भाग गई।
उस समय तक ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मुसलमानों को एक और शानदार विजय मिलने वाली है।
लेकिन इसी निर्णायक क्षण में एक ऐसी घटना घटी जिसने पूरे युद्ध का परिणाम बदल दिया।
(जारी रहेगा — अगले भाग में तीरंदाज़ों का अपनी जगह छोड़ना, खालिद बिन वलीद का पीछे से हमला और ग़ज़वा-ए-उहुद का निर्णायक मोड़ विस्तार से प्रस्तुत किया जाएगा।)


