Arsh e Haq Hai Masnad e Rifat Lyrics in Hindi, Urdu & Roman

Arsh-e-Haq Hai Masnad-e-Rifat Lyrics

अस्सलामू अलैकुम दोस्तों, आज के इस रूहानी ब्लॉग पोस्ट में हम आपके लिए लेकर आए हैं आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान रज़ियल्लाहु अन्हु का एक और रूह को सुकून देने वाला कलाम, जिसका उनवान है “अर्श-ए-हक़ है मसनद-ए-रिफ़अत रसूलुल्लाह की”। इस नात-ए-पाक में हुज़ूर पाक ﷺ की अज़मत, उनकी शान-ओ-शौकत और उनके हुज़ूर की बारगाह से मिलने वाली नेमतों का बहुत ही ख़ूबसूरत ज़िक्र है।

नीचे इस कलाम के तमाम अशआर को उर्दू, हिंदी और रोमन हिंदी (Transliteration) में पेश किया गया है।

1. Arsh e Haq Hai Masnad e Rifat Lyrics in Roman Hindi (रोमन हिंदी)

Arsh-e-Haq Hai Masnad-e-Rifat Rasoolullah Ki

Arsh-e-haq hai masnad-e-rifat rasoolullah ki Dekhni hai hashr mein izzat rasoolullah ki

Qabr mein lahraenge ta-hashr chashme noor ke Jalwa-farma hogi jab talat rasoolullah ki

Kafiron par taigh-e-wala se giri barq-e-ghazab Abr-aasa chha gayi haibat rasoolullah ki

La wa rabbil arsh jis ko jo mila un se mila Bat-ti hai kounain mein neemat rasoolullah ki

Wo jahannam mein gaya jo un se mustaghni hua Hai khaleelullah ko haajat rasoolullah ki

Sooraj ulte paaon palte chand ishaare se ho chaak Andhe najdi dekh le qudrat rasoolullah ki

Tujh se aur jannat se kya matlab wahabi door ho Hum rasoolullah ke jannat rasoolullah ki

Zikr roke fazl kaate nuqs ka jooyan rahe Phir kahe mardak ke hoon ummat rasoolullah ki

Najdi us ne tujh ko mohlat di ke is aalam mein hai Kafir-o-murtad pe bhi rahmat rasoolullah ki

Hum bhikhari wo kareem un ka khuda un se fuzoon Aur na-kehna nahin aadat rasoolullah ki

Ahle sunnat ka hai beeda paar ashaab-e-huzoor Najm hain aur nao hai itrat rasoolullah ki

Khak ho kar ishq mein aaram se sona mila Jaan ki ikseer hai ulfat rasoolullah ki

Toot jaenge gunahgaron ke fauran qaid-o-band Hashr ko khul jaegi taqat rasoolullah ki

Ya-rabb ik saat mein dhul jaen siyah-karon ke jurm Josh mein aa-jaaye ab rahmat rasoolullah ki

Hai gul-e-baagh-e-qudus rukhsar-e-zeba-e-huzoor Sarv-e-gulzar-e-qadam qaamat rasoolullah ki

Ae Raza khud sahib-e-quran hai maddah-e-huzoor Tujh se kab mumkin hai phir midhat rasoolullah ki

2. Arsh e Haq Hai Masnad e Rifat Lyrics in Hindi (हिंदी)

अर्श-ए-हक़ है मसनद-ए-रिफ़अत रसूलुल्लाह की

अर्श-ए-हक़ है मसनद-ए-रिफ़अत रसूलुल्लाह की देखनी है हश्र में इज़्ज़त रसूलुल्लाह की

क़ब्र में लहराएंगे ता-हश्र चश्मे नूर के जल्वा फ़र्मा होगी जब तलअत रसूलुल्लाह की

काफ़िरों पर तेग़-ए-वाला से गिरी बर्क़-ए-ग़ज़ब अब्र आसा छा गई हैबत रसूलुल्लाह की

ला व रब्बिल अर्श जिस को जो मिला उन से मिला बटती है कौनैन में नेमत रसूलुल्लाह की

वह जहन्नम में गया जो उन से मुस्तग़नी हुआ है ख़लीलुल्लाह को हाजत रसूलुल्लाह की

सूरज उल्टे पांव पलटे चांद इशारे से हो चाक अन्धे नज्दी देख ले क़ुदरत रसूलुल्लाह की

तुझ से और जन्नत से क्या मतलब वहाबी दूर हो हम रसूलुल्लाह के जन्नत रसूलुल्लाह की

ज़िक्र रोके फ़ज़ल काटे नुक़्स का जोयां रहे फिर कहे मर्दक कि हूं उम्मत रसूलुल्लाह की

नज्दी उस ने तुझ को मोहलत दी कि इस आलम में है काफ़िर व मुर्तद पे भी रहमत रसूलुल्लाह की

हम भिकारी वह करीम उन का ख़ुदा उन से फ़ुज़ूं और ना कहना नहीं आदत रसूलुल्लाह की

अहल-ए-सुन्नत का है बीड़ा पार अस्हाब-ए-हुज़ूर नज्म हैं और नाव है इत्रत रसूलुल्लाह की

ख़ाक हो कर इश्क़ में आराम से सोना मिला जान की इक्सीर है उल्फ़त रसूलुल्लाह की

टूट जाएंगे गुनहगारों के फ़ौरन क़ैद व बन्द हश्र को खुल जाएगी ताक़त रसूलुल्लाह की

या-रब इक साअत में धुल जाएं सियह-कारों के जुर्म जोश में आ जाए अब रहमत रसूलुल्लाह की

है गुल-ए-बाग़-ए-क़ुदुस रुख़्सार-ए-ज़ेबा-ए-हुज़ूर सर्व-ए-गुल्ज़ार-ए-क़दम क़ामत रसूलुल्लाह की

ऐ रज़ा ख़ुद साहिब-ए-क़ु़रान है मद्दाह-ए-हुज़ूर तुझ से कब मुम्किन है फिर मिदहत रसूलुल्लाह की

3.Arsh e Haq Hai Masnad e Rifat Lyrics in Urdu (उर्दू)

عرشِ حق ہے مسندِ رِفعت رسول اللہ کی

عرشِ حق ہے مسندِ رِفعت رسول اللہ کی

دیکھنی ہے حشر میں عزّت رسول اللہ کی

قبر میں لہرائیں گے تا حشر چشمے نُور کے

جلوہ فرما ہوگی جب طلعت رسول اللہ کی

کافروں پر تیغِ والا سے گِری برقِ غضب

اَبر آسا چھا گئی ہیبت رسول اللہ کی

لَا وَرَبِّ الْعَرْش جس کو جو مِلا ان سے ملا

بٹتی है کونین میں نعمت رسول اللہ کی

وہ جہنم میں گیا جو اُن سے مستغنی ہوا

ہے خلیل اللہ کو حاجت رسول اللہ کی

سُورج اُلٹے پاؤں پلٹے چاند اِشارے سے ہو چاک

اندھے نجدی دیکھ لے قدرت رسول اللہ کی

تجھ سے اور جنّت سے کیا مطلب وہابی دُور ہو

ہم رسول اللہ के جنّت رسول اللہ کی

ذِکر روکے فضل کاٹے نقص کا جویاں رہے

پھر کہے مردک کہ ہوں امّت رسول اللہ کی

نجدی اُس نے تجھ کو مہلت دی کہ اس عالم میں ہے

کافر و مرتَد پہ بھی رحمت رسول اللہ کی

ہم بھکاری وہ کریم اُن کا خدا اُن سے فُزُوں

اور نا کہنا نہیں عادت رسول اللہ کی

اهلِ سنّت کا ہے بیڑا پار اَصحابِ حضور

نجم ہیں اور ناؤ ہے عترت رسول اللہ کی

خاک ہو کر عشق میں آرام سے سونا مِلا

جان کی اِکسیر ہے اُلفت رسول اللہ کی

ٹُوٹ جائیں گے گنہگاروں کے فوراً قید و بند

حشر کو کھل جائے گی طاقت رسول اللہ کی

یاربّ اِک ساعت میں دُھل جائیں سیہ کاروں کے جرم

جوش میں آجائے اب رحمت رسول اللہ کی

ہے گل باغ قُدُس رُخسارِ زَیبائے حضور!

سر وِ گلزارِ قدم قامت رسول اللہ کی

اے رضاؔ خود صاحبِ قرآں ہے مَدَّاحِ حضور

تجھ سے کب ممکن ہے پھر مِدحت رسول اللہ کی

1. मुश्किल अलफ़ाज़ के मायने (Difficult Word Meanings)

पाठकों की आसानी के लिए कलाम में इस्तेमाल हुए कुछ अहम और कठिन शब्दों के अर्थ नीचे दिए गए हैं:

मुश्किल अलफ़ाज़ (Word)हिन्दी अर्थ (Meaning in Hindi)
मसनद-ए-रिफ़अत (Masnad-e-Rifat)बुलंदी का तख्त / सर्वोच्च सिंहासन
तलअत (Talat)नूरानी चेहरा / पावन मुखमंडल
तेग़-ए-वाला (Taigh-e-Wala)महान या बुलंद तलवार
मुस्तग़नी (Mustaghni)बेपरवाह होना / बेनियाज़ होना (यानी नबी की परवाह न करने वाला)
खलीलुलल्लाह (Khaleelullah)अल्लाह के दोस्त (हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम का लक़ब)
कौनेन (Kounain)दोनों जहां (दोनों लोक – दुनिया और आख़िरत)
अस्हाब (Ashaab)नबी करीम ﷺ के साथी (साहबा इकराम)
इत्रत (Itrat)नबी करीम ﷺ का ख़ानदान / अहले बैत
इक्सीर (Ikseer)पारस / वह दवा जो हर मर्ज़ को ठीक कर दे या मिट्टी को सोना बना दे
मिदहत / मद्दाह (Midhat / Maddah)मिदहत यानी तारीफ़, मद्दाह यानी तारीफ़ करने वाला
ला-मकां (La-Makan)वह स्थान जो सीमाओं से परे हो (जहाँ जगह की बंदिश न हो)

2. कलाम का तआरुफ़ और मरकज़ी ख़याल (Introduction & Central Theme):

यह आलीशान नात-ए-पाक इमाम-ए-अहले-सुन्नत आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी द्वारा रचित है। इस पूरे कलाम का मुख्य केंद्र (Central Theme) हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की बेमिसाल अज़मत, सर्वोच्च मर्तबा और अल्लाह की बारगाह में उनकी मक़बूलियत को बयान करना है।

अशआर की तशरीह (मुख्य बिंदु):

  • नबी पाक ﷺ का मर्तबा: आला हज़रत फ़रमाते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ की बुलंदी का ठिकाना अल्लाह का अर्श है। वह दोनों जहान के सुल्तान हैं और कायनात में जिसे जो कुछ भी मिला है, वह उन्हीं के सदक़े और उन्हीं के हाथों से मिला है।
  • अम्बिया इकराम और मोज़िज़ात: इस कलाम में हुज़ूर ﷺ के मोज़िज़ात (चमत्कारों) का ज़िक्र करते हुए बताया गया है कि कैसे उनके इशारे से चांद दो टुकड़े हो गया और डूबा हुआ सूरज वापस पलट आया। यहाँ तक कि हज़रत इब्राहिम (खलीलुल्लाह) जैसी महान हस्तियों को भी महशर (क़यामत) के दिन हुज़ूर ﷺ की शफ़ाअत (सिफ़ारिश) की ज़रूरत होगी।
  • क़ब्र और आख़िरत का सहारा: आला हज़रत का यह दृढ़ विश्वास है कि क़यामत के मैदान में जब हर कोई परेशान होगा, तब हुज़ूर ﷺ की इज़्ज़त और शान देखने लायक होगी। जब हुज़ूर ﷺ का नूरानी चेहरा क़ब्र में जलवा-अफ़रोज़ होगा, तो गुनहगारों की क़ब्र भी नूर के चश्मों से जगमगा उठेगी।
  • अहले बैत और साहबा की अहमियत: कलाम के आख़िरी हिस्से में आला हज़रत फ़रमाते हैं कि जो इंसान नबी पाक ﷺ की उम्मत का बेड़ा पार लगाना चाहता है, उसके लिए नबी के साहबा (साथी) सितारों की तरह राह दिखाने वाले हैं और नबी की इत्रत (अहले बैत यानी उनका परिवार) एक मज़बूत कश्ती की तरह है जो हमें पार लगाएगी।

निष्कर्ष (Conclusion):

आख़िर में आला हज़रत फ़रमाते हैं कि ऐ रज़ा! तुम्हारी क्या मजाल कि तुम नबी की मुकम्मल तारीफ़ (मिदहत) कर सको, क्योंकि स्वयं अल्लाह की किताब (क़ुरान) हुज़ूर ﷺ की तारीफ़ और सना बयान करती है।

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